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गीता नाम अध्याय श्लोक 11

गीता नवम अध्याय  श्लोक ll 11 ll  अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌।  परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌॥ हिंदी अनुवाद  मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान्‌ ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात्‌ अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं ॥

गीता नवम अध्याय, श्लोक ll 10 ll

गीता नवम अध्याय  श्लोक ll 10 ll मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं।  हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है ॥

गीता श्लोकl 8l

गीता नवम अध्याय  श्लोक  ll8 ll प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।  भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌॥ हिंदी अनुवाद  अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ ॥

गीता नवम अध्याय, श्लोक ll 7 ll

गीता नवम अध्याय  श्लोक   ll7ll ( जगत की उत्पत्ति का विषय )   सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌।  कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌॥ हिंदी अनुवाद   हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ ॥

गीत गीता नाम अध्याय श्लोकll6ll

गीता नवम अध्याय  श्लोक ll 6 ll यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌।  तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ हिंदी अनुवाद  जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान ॥

गीता नवम अध्याय, श्लोक ll 5 ll

गीता नवम अध्याय  श्लोक ll 5 ll न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌।  भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ हिंदी अनुवाद  वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है ॥

गीता नामअध्याय श्लोक 4

 गीता नवम अध्याय श्लोक ll 4 ll मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।  मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः॥ हिंदी अनुवाद  मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ ॥

गीता नवम अध्याय श्लोक 3

गीता नवम अध्याय  श्लोक ll 3 ll अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।  अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ हिंदी अनुवाद  हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं ॥

गीता नवम अध्याय, श्लोक ll 2 ll

गीता नवम अध्याय  श्लोक || 2 || राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌।  प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌॥ हिंदी अनुवाद  यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है ॥

गीता नवम अध्याय श्लोक || 1||

गीता नवम  अध्याय  श्लोक || 1||  ( प्रभावसहित ज्ञान का विषय )   श्रीभगवानुवाच  इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।  ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ हिंदी अनुवाद  श्री भगवान बोले- तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 28 ll

गीता अष्ट्म अध्याय  श्लोक ll 28 ll वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌।  अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌॥ हिंदी  अनुवाद  योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है ॥   ॐ तत्सदिति श्री मद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥8॥

गीता अष्टम अध्याय श्लोक ll 27 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 27 ll नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।  तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥ हिंदी अनुवाद  हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो ॥

गीत अष्टम अध्याय श्लोक ll26ll

गीता अष्ट्म अध्याय,  श्लोक ll 26 ll शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।  एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः॥ हिंदी अनुवाद  क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ, जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ, अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी,  फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 25 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 25 ll धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌।  तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ हिंदी अनुवाद  जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 24 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll24 ll अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌।  तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥ हिंदी अनुवाद  जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll23 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll23ll  यत्र काले त्वनावत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।  प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! जिस काल में शरीर त्याग कर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा ॥ Note: (यहाँ काल शब्द से मार्ग समझना चाहिए, क्योंकि आगे के श्लोकों में भगवान ने इसका नाम 'सृति', 'गति' ऐसा कहा है।)

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 22 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 22 ll पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।  यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌॥ हिंदी अनुवाद  हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है (गीता अध्याय 9 श्लोक 4 में देखना चाहिए), वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य (गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में इसका विस्तार देखना चाहिए) भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है ॥

गीता अष्टम अधयाय, श्लोक ll 21 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 21 ll अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।  यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ हिंदी अनुवाद  जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 20 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 20 ll परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।  यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ हिंदी अनुवाद  उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 19 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 19 ll भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।  रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥ हिंदी अनुवाद  हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 18 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 18 || अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।  रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥ हिंदी अनुवाद  संपूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं ॥

गीता अष्ट्म अध्याय, श्लोक ll 17 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 17 ll सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।  रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥ हिंदी अनुवाद  ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले हैं ॥

गीता अष्ट्मी अध्याय, श्लोक ll 16 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 16 ll आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।  मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं ॥

गीता अष्ट्मी अद्याय, श्लोक ll 15 ll

 गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 15 ll मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌।  नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥ हिंदी अनुवाद  परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 14 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 14 ll अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।  तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ॥

गीता अष्ट्म अध्याय, श्लोक ll 12- 13 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 12- 13 ll सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।  मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌॥  ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌।  यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌॥ हिंदी अनुवाद  सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है  ॥

गीता अष्ट्म अध्याय, श्लोक ll 11 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 11 ll यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।  यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ हिंदी अनुवाद  वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा  ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 10 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 10 ll प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।  भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌। हिंदी अनुवाद  वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है  ॥

गीता अष्ट्म अध्याय, श्लोक ll 9 ll

गीता अष्टम अध्याय  श्लोक ll 9 ll कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।  सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌॥ हिंदी अनुवाद  जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता (अंतर्यामी रूप से स प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्म के अनुसार शासन करने वाला) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है  ॥

श्लोक ll 8 ll

गीता  अष्टम अध्याय  श्लोक ll 8 ll  अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।  परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌॥ हिंदी अनुवाद  हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है  ॥

गीता अस्टम अध्याय

गीता अस्टम अध्याय  श्लोक ll 7 ll तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च।  मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌॥ हिंदी अनुवाद  इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा  ॥

गीता अस्टम अध्याय

गीता अस्टम अध्याय  श्लोक ll 6 ll यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌।  तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥ हिंदी अनुवाद  हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है  ॥

गीता सप्तम अद्याय, श्लोक ll 29 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 29 ll जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।  ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌॥ हिंदी अनुवाद  जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते है  ॥

गीता अस्टम अध्याय, श्लोक ll4 ll

गीता अस्टम अध्याय  श्लोक ll 4 ll अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌।  अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ हिंदी अनुवाद  उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ  ॥

गीता अस्टमी अध्याय, श्लोक ll 5 ll

गीता अस्टम अध्याय  श्लोक ll 5 ll अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌।  यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ हिंदी अनुवाद  जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है  ॥

गीता अस्टम अध्याय, श्लोक ll 3 ll

गीता अस्टम अध्याय  श्लोक ll 3 ll श्रीभगवानुवाच  अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।  भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ हिंदी अनुवाद  श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है ॥

गीता अष्टम अध्याय, श्लोक ll 2 ll

गीता अस्टमी अध्याय  श्लोक ll 2 ll अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।  प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ हिंदी अनुवाद  हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं ॥

गीता अस्टमी अध्याय, श्लोक ll 1 ll

गीता अस्टम  अध्याय  श्लोक ll 1 ll  अर्जुन उवाच  किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम।  अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥   हिंदी अनुवाद  अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 30 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 30 ll साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।  प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ हिंदी अनुवाद  जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं ॥     ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥

गीता सप्तम अद्याय, श्लोक ll 29 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 29 ll जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।  ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌॥ हिंदी अनुवाद  जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते है  ॥

गीता सप्तम अध्याय श्लोक ll 28 ll

गीता सप्तम अध्याय  अलोक ll 28 ll येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌।  ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ हिंदी अनुवाद  परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 27 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 27 ll इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।  सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ हिंदी अनुवाद  हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं ॥

श्रीमद भागवद गीता सप्तम अध्याय श्लोक ll 26 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 26 ll वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।  भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ हिंदी श्लोक वर्णन  हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 25 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 25 ll नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।  मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्‌॥ हिंदी अनुवाद  अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 24 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 24 ll ( भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा )   अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।  परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्‌॥ हिंदी श्लोक वर्णन  बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं ॥

श्रीमद भागवद गीता हिंदी श्लोक वर्णन

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 23 ll अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌।  देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ हिंदी अनुवाद  परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते है ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 22 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 22 ll स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।  लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌॥ हिंदी अनुवाद  वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है ॥

श्रीमद भागवद गीता, श्लोक ll 21 ll

गीता सप्तम अध्यस्य  श्लोक ll 21 ll यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।  तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌॥ हिंदी अनुवाद  जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ  ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 19 ll

गीता सप्तम अध्याय श्लोक ll 19 ll बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।  वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ हिंदी अनुवाद   बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 18 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 18 ll उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌।  आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्‌॥ हिंदी अनुवाद  ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात्‌ मेरा स्वरूप ही है- ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है  ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 15 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll15 ll न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।  माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ हिंदी अनुवाद  माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते ॥

गीता सप्तम अध्याय

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 14  दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।  मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ हिंदी अनुवाद  क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात्‌ संसार से तर जाते हैं  ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 13 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 13 ll (आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा)  त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्‌।  मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्‌॥ हिंदी अनुवाद  गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 12 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 12 ll ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये।  मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ हिंदी अनुवाद  और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में (गीता अ. 9 श्लोक 4-5 में देखना चाहिए) उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 11 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 11 ll बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌।  धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ हिंदी अनुवाद  हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ  ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 10 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 10 ll बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्‌।  बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ  ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 9 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 9 ll पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।  जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ हिंदी अनुवाद  मैं पृथ्वी में पवित्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध से इस प्रसंग में इनके कारण रूप तन्मात्राओं का ग्रहण है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए उनके साथ पवित्र शब्द जोड़ा गया है।) गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ ॥

गीता सप्तम अध्याय, श्लोक ll 8 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 8 ll ( संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन )   रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।  प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ ॥

गीता सप्तम अध्याय श्लोक ll 7 ll

गीता सप्तम अध्याय  श्लोक ll 7 ll मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।  मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ हिंदी अनुवाद  हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है ॥