सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गीता अष्टम अधयाय, श्लोक ll 21 ll

गीता अष्टम अध्याय 

श्लोक ll 21 ll

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।
 यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥

हिंदी अनुवाद 

जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है ॥

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गीता षष्टम अध्याय, श्लोक ll 28 ll

गीता षष्टम अध्याय  श्लोक ll 28 ll युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।  सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥ हिंदी अनुवाद  वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है ॥

गीता अध्याय ll 14 ll, श्लोक ll 9 ll

गीता अध्याय ll 14 ll श्लोक ll 9 ll सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है ॥

गीता षष्टम अध्याय, श्लोक ll 43 ll

गीता षष्टम अध्याय  श्लोक ll 43 ll तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌।  यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥ हिंदी अनवाद  वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है ॥