सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गीता प्रथम अध्याय, श्लोक ll 30 ll

गीता प्रथम अध्याय 

 
श्लोक ll 30 ll

(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन ) 
 अर्जुन उवाच
 दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥
 सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। 
 वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥

हिंदी अनुवाद 
~~~~~~~~~~~~
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है ll
 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गीता अध्याय ll 18 ll, श्लोक ll 14 ll

गीता अध्याय ll 18 ll श्लोक ll 14 ll अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥ हिंदी अनुवाद इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है ||

गीता अध्याय ll 18 ll, श्लोक ll 68 ll

गीता अध्याय ll 18 ll श्लोक ll 68 ll य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ हिंदी अनुवाद  जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है ॥

गीतध्याय ll 18 ll, श्लोक ll 9 ll

गीता अध्याय ll 18 ll श्लोक ll 9 ll कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन। सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ हिंदी अनुवाद हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है ॥