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गीता अध्याय ll 17 ll, श्लोक ll 27 ll

गीता अध्याय ll 17 ll

श्लोक ll 28 ll

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥

हिंदी अनुवाद 

हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही ॥ 

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गीता अध्याय ll18 ll श्लोक ll 65 ll मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।  मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ हिंदी अनुवाद हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है॥