सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गीता अध्याय ll 15 ll, श्लोक ll 12 ll

गीता अद्याय ll 15 ll

श्लोक ll 12 ll

प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का विषय)
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌॥

हिंदी अनुवाद

सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान ॥

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गीता अध्याय ll 18 ll, श्लोक ll 14 ll

गीता अध्याय ll 18 ll श्लोक ll 14 ll अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥ हिंदी अनुवाद इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है ||

गीता अध्याय ll 18 ll, श्लोक ll 68 ll

गीता अध्याय ll 18 ll श्लोक ll 68 ll य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ हिंदी अनुवाद  जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है ॥

गीता अध्याय ll 15 ll, श्लोक ll 14 ll

गीता अध्याय ll 15 ll श्लोक ll14 ll अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌॥ हिंदी अनुवाद मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि) प्रकार के अन्न को पचाता हूँ ||