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गीता दशम अध्याय श्लोक 38

गीता दशम अध्याय  श्लोक ||38|| दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌॥  हदी अनुवाद मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ ॥

गीता दशम अध्याय श्लोक 37

गीता दशम अध्याय  श्लोक ll 37 ll वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ हिंदी अनुवाद  वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हु ॥

गीता दशम अध्याय श्लोक 36

गीता दशम अध्याय  श्लोक 36 द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌॥  हदी अनुवाद मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ ॥

गीता दशम अध्याय, श्लोक ll 35 ll

गीता दशम अध्याय  श्लोक ll 35 ll बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ हिंदी अनुवाद  तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ ॥

गीता दशम अध्याय श्लोक 34

गीता दशम अध्याय  श्लोक  ||34|| मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥  हिंदी अनुवाद मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति (कीर्ति आदि ये सात देवताओं की स्त्रियाँ और स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी प्रसिद्ध हैं, इसलिए दोनों प्रकार से ही भगवान की विभूतियाँ हैं), श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ ॥
  गीता दशम अध्याय  श्लोक || 33 || अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ हिंदी अनुवाद  मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हू ॥

गीता दशम अध्याय, श्लोक ll32 ll

गीता दशम अध्याय  श्लोक ll 32 ll सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ ॥