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गीता द्वितीय अध्ययन, श्लोक ll 33 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll 33 ll अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।  ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥ हिंदी अनुवाद  किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ॥

गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक ll 32 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll 32 ll यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।  सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥ हिंदी अनुवाद  हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं ॥

गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक ll 31 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll 31 ll ( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।  धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥ हिंदी अनुवाद  तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है ॥

गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक ll 30 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll  30 ll देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।  तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है ॥

गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक ll 29 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll 29 ll आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-  माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।  आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति  श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥ हिंदी अनुवाद  कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता ॥

गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक ll 28 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll 28 ll अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।  अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥ हिंदी अनुवाद  हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है? ॥

गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक ll 27 ll

गीता द्वितीय अध्याय  श्लोक ll 27 ll जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।  तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ हिंदी अनुवाद  क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है ॥